shanidham amritsar vallah
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Shani Sadhe Satti dhaiya
The Sadhe Satti
The Planet Saturn (Shani) takes on an average a little over 29 months to traverse through each constellation or sign or Rashi of the zodiac. This can be rounded up to 2.5 years per sign or 30 years for one revolution around the zodiac. Saturn is the outermost planet that describes more than one revolution around the zodiac during the lifetime of most human beings.
When Saturn arrives in the sign in 12th from the birth moon, the moon sign itself and the sign next to the moon sign, takes about 7.5 years and the term for 7.5 in is ‘SadheSatti Period’. This phase of 7.5 years repeats again in about 30 years and so, many individuals may experience 2 to 3 such periods during their lifetime.
To give an example of the periods described above, if we assume that one was born in the Aries moon sign in the birth chart. when Saturn transits the signs of Pisces, Aries and Taurus, the individual will experience sadhesati .
Hence the SadheSatti affects the people of three signs, at a time. In the first phase of it, when Shani transits over the sign prior to the natal moon sign, its effect is said to have over the head. After two & a half years when Shani transits over the natal moon, it is the second phase of SadheSatti. Its position and affective area is the heart.
Further after two & half years when Shani transits over the next sign from the natal moon, it affects the feet of the native. Thus, for various signs, Shani’s SadheSatti is calculated. It gives both types of results, the good and the bad.
Sometime, the whole period of SadheSatti gives adverse affects through problems and troubles. However, to a very few people, SadheSatti gives benefic effects throughout its whole period. It makes them happy, perspicuous and an honourable person. Performing remedial measures during the SadheSatti period of Shani, it inclines to the benefic results and declines the malefic ones.
The following remedial measure can be made to cut down the malefic results of the SadheSati of the Shani : -
- Put eight kilograms of mustard oil in an iron pot and look your face into it. Now, take this oil in Shani temple and offer the oil at Shani idol while wearing wet red Lungi. It is an appropriate manner of ‘Telabhishek’ (bathing Shani idol with oil).
The Dhaiya
When Shani transiting over the Fourth and the Eighth house from the Natal Moon, it is called the Fourth & the Eighth Dhaiya respectively.
Shani takes complete 30 years to take a round of the zodiac. Thus, it remains for two and a half years over each sign. When Shani transits over the fourth or the eighth house from natal moon, it is called 'Dhaiya'. These two periods of 'Dhaiya' leave the good and the bad effects over the native. Every body has to pass through this period. Those having malefic effects of Shani, should perform remedial measures, without fail. In the 'Dhaiya' of Shani, its impact on our life increases and the malefic position causes to increase malefic effects. The benefic effects of moon are turned down and are gone useless. Thus, the native gets surrounded by the problems and the troubles.
Perform the following remedial measures to nullify the adverse (malefic) effects during the period of Dhaiya: -
- Write “Tainteesa Yantra (device)” over a white cloth with collyrium or black ink and put a dry coconut fruit over it and wrap this cloth like a parcel. Circumambulate this parcel over the head of the native seven times and throw it into the flowing water. Such a remedial measure be done on continuous three 'Shani Amavasya'. It would help to nullify Shani related problems.
- Whosoever is affected by the 'Dhaiya', he himself should enchant the below mentioned Tantric-Mantra of Shani, to obtain the grace of Lord Shani -
[[PASTING TABLES IS NOT SUPPORTED]]
How to Enchant : 21 series of this Mantra be enchanted. Enchant them for continuous 40 days. Don’t break the chain while doing so. It should not be stopped in between. Enchant the Mantra sitting on the same place every day. Observe celibacy and take pure and vegetarian food only. Keep fasting on Saturday and donate oil, urad, gram etc.
- Arrange a feast for mendicants in Shani temple for eight Saturdays, if possible.
- Offer vermillion to Hanuman ji every tuesday.
- Arrange enchantment of “Mahamrityunja Japa”.
- A part of your food should be offered to a crow.
ढैय्या का विचार
जब शनिदेव चंद्र कुंडली अर्थात जन्म राशि के अनुसार
चतुर्थ व अष्टम से गोचर करते हैं तो जातक को ढैय्या देते हैं। ढैय्या का
मतलब होता है ढाई वर्ष। वैसे तो शनिदेव प्रत्येक राशि में ही ढाई वर्ष रहता
हैं। परन्तु ढैय्या का विचार और कहीं से नहीं होता है। फिर चतुर्थ और
अष्टम से ही क्यों ? क्योंकि शनिदेव प्रत्येक भाव में धर्म, अर्थ, काम,
मोक्ष के अनुसार फल देते हैं। चतुर्थ और अष्टम भाव मोक्ष के भाव हैं। आज
दुनिया में ज्यादातर व्यक्ति धर्म की तरफ कम और भौतिक सुखों की तरफ ज्यादा
ध्यान दे रहे हैं। परन्तु ज्योतिष का नियम है कि शनिदेव जिस भाव से धर्म,
अर्थ, काम, मोक्ष के लिए गोचर करे, उसी के अनुरूप व्यक्ति को कार्य करना
चाहिए। जो व्यक्ति ढैय्या में तीर्थ यात्रा, समुद्र स्नान और धर्म के कार्य
दान-पुण्य इत्यादि करते हैं, उन्हें ढैय्या में भी शुभ फल की प्राप्ति
होती है। लेकिन जो उस अवधि में इन कामों से दूर रहते हैं, उन्हें अपने ही
पूर्वकृत अशुभ कर्मों के फलस्वरूप शारीरिक-मानसिक परेशानी और कारोबार में
हानि होती है।
चतुर्थ भाव की ढैय्या
ढैय्या का फल जानने के लिए सर्वप्रथम यह देखा जाता
है कि शनिदेव किस भाव में बैठे हैं और कहां-कहां उनकी तीसरी, सातवीं व
दसवीं पूर्ण दृष्टि पड़ रही है क्योंकि उन भावों से संबंधित बातों में जातक
को पूर्वकर्मवश अशुभ फल की प्राप्ति होती है। चतुर्थ भाव से शनिदेव छठे भाव
को, दशम भाव को तथा लग्न को देखते हैं। अर्थात् जब शनिदेव चतुर्थ भाव से
गोचर करते हैं तो जातक के निजकृत पूर्व के अशुभ कर्मों के फलस्वरूप उसके
भौतिक सुखों यानी मकान व वाहन आदि में परेशानी पैदा होती है जिसका संकेत
कुण्डली में शनिदेव की स्थिति दिया करती है। जिसकी वजह से उसके कारोबार में
फर्क पड़ता है। उसकी परेशानी बढ़ जाती है। परेशानियों के बढ़ने से जातक को
शारीरिक कष्ट की भी प्राप्ति होती है। अर्थात् चतुर्थ भाव की ढैय्या में
मकान खरीदना या बेचना नहीं चाहिए। साथ ही अपने व्यवसाय में भी कोई विशेष
परिवर्तन नहीं करना चाहिए। जो व्यक्ति अधिकतर शांत रहते हैं और धार्मिक
कार्यों में संलग्न रहते हैं, ऐसे व्यक्तियों को चतुर्थ ढैय्या में किसी भी
प्रकार की परेशानी पैदा नहीं होती है। और जो व्यक्ति नया कार्य करते हैं,
उन्हें परेशानी पैदा होती है।
अष्टम भाव की ढैय्या
जब शनिदेव चंद्र कुंडली अर्थात जन्म राशि के अनुसार
अष्टम भाव से गोचर करते हैं तो ढैय्या देते हैं, अष्टम ढैय्या चतुर्थ की
ढैय्या से ज्यादा अशुभ फलों का संकेत देती है। मेरे अनुभव के अनुसार जब यह
ढैय्या शुरू होती है तो जातक को शुभ फल की प्राप्ति होती है और वह नया
कार्य करने लगता है। परन्तु अष्टम ढैय्या नया कार्य शुरू कराकर बीच में ही
धोखा दे जाती है। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को अष्टम ढैय्या में विशेष
सावधानी बरतनी चाहिए। क्योंकि अष्टम भाव से शनिदेव तीसरी दृष्टि से दशम भाव
को सप्तम दृष्टि से द्वितीय भाव को और दशम दृष्टि से पंचम भाव को देखता
है। अष्टम ढैय्या सबसे पहले कारोबार में परेशानी पैदा करती है। जिसकी वजह
से जातक के निजी कुटुंब और धन पर बुरा असर पड़ता हैं तथा धन की वजह से जातक
के संतान के ऊपर भी कुप्रभाव पड़ता है। अष्टम ढैय्या में देश, काल व पात्र
के अनुसार संतान को कष्ट अथवा संतान से कष्ट प्राप्त होता है। अत: जातक को
अष्टम ढैय्या में कोई भी नया कार्य, यानी बैंक आदि से कर्ज या जमीन-जायदाद
का खरीदना-बेचना या पिता की संपत्ति को बांटना नुकसानदायक होता है। अत: इस
ढैय्या के दौरान ये कार्य नहीं करने चाहिए। अष्टम ढैय्या में जो व्यक्ति
धार्मिक कार्य, समुद्र स्नान व तीर्थ यात्रा आदि करता है और परमात्मा को
हाजिर-नाजिर रखता है तो उस व्यक्ति को अष्टम ढैय्या में किसी भी प्रकार की
परेशानी नहीं होती है। जो व्यक्ति परमात्मा में विश्वास नहीं करते हैं,
उन्हें शनिदेव लालच देकर ऐसा फंसा देता है कि वे जीवन भर परेशान रहते हैं।
फिर भी याद रहे, इस प्रतिकूल परिस्थिति के पीछे भी संबंधित जातक के
पूर्वकृत अशुभ कर्म ही रहते हैं।
ढैय्या किसको और कब
- शनिदेव जब कर्क एवं वृश्चिक राशि में भ्रमण करते हैं तो मेष राशि के लोगों पर शनिदेव की ढैय्या रहती है।
- शनिदेव सिंह व धनु राशि में गोचर में भ्रमण करते हैं, तब वृष राशि के लोगों पर शनिदेव की ढैय्या रहती है।
- कन्या व मकर राशि में शनिदेव के भ्रमणकाल में मिथुन राशि के लोगों पर शनिदेव की ढैय्या रहती है।
- तुला एवं कुम्भ राशि में गोचर में शनिदेव जब भ्रमण करते हैं तब कर्क राशि के लोगों पर शनिदेव की ढैय्या रहती है।
- गोचर भ्रमणकाल में शनिदेव जब वृश्चिक और मीन राशि में आते हैं तो सिंह राशि वालों पर शनिदेव की ढैय्या रहती है।
- शनिदेव जब धनु और मेष राशि में स्थित होते हैं तो कन्या राशि के लोगों पर शनिदेव की ढैय्या रहती है।
- शनिदेव जब मकर एवं वृष राशि में गोचर में स्थित रहते हैं तब तुला राशि के जातकों पर शनिदेव की ढैय्या रहती है।
- गोचर में शनिदेव जब कुंभ और मिथुन राशि में प्रवेश करते हैं तो वृश्चिक राशि के लोगों पर शनिदेव की ढैय्या रहती है।
- शनिदेव जब गोचर में मीन तथा कर्क राशि में स्थित रहते हैं तब धनु राशि के लोगों पर शनिदेव की ढैय्या रहती है।
- जब शनिदेव मेष और सिंह राशि से गोचर करते हैं तब मकर राशि वालों को शनिदेव की ढैय्या प्रारम्भ होती है।
- गोचर में शनिदेव जब वृष और कन्या राशि में आते हैं तब कुम्भ राशि वालों को शनिदेव की ढैय्या प्रारम्भ होती है।
- शनिदेव जब गोचर में मिथुन व तुला राशि में गोचर करते हैं तब मीन राशि वाले लोगों को शनिदेव की ढैय्या प्रारम्भ होती है।
ढैय्या में व्यक्ति को धैर्य से काम लेना चाहिए
क्योंकि ढैय्या में व्यक्ति को अपने सगे संबंधियों की भी मदद कम से कम
मिलती है। इसलिए स्वयं सभी कार्य करने पड़ते हैं। इसलिए प्रतिदिन प्रात:काल
चिड़ियों को दाना डालें, उनके लिए पानी रखें। चींटियों को आटा शक्कर डालें
और स्नान आदि से निवृत होकर सूर्य को प्रतिदिन जल दें। बुरे कार्यों से
बचें। ढैय्या में सलता प्राप्त होगी। वैसे आगे उपाय विस्तार से लिखे हुए
हैं परंतु उपरोक्त बातें दैनिक जीवन में जरूरी हैं।
जब शनिदेव चंद्र कुंडली अर्थात जन्म राशि के अनुसार चतुर्थ व अष्टम से गोचर करते हैं तो जातक को ढैय्या देते हैं। ढैय्या का मतलब होता है ढाई वर्ष। वैसे तो शनिदेव प्रत्येक राशि में ही ढाई वर्ष रहता हैं। परन्तु ढैय्या का विचार और कहीं से नहीं होता है। फिर चतुर्थ और अष्टम से ही क्यों ? क्योंकि शनिदेव प्रत्येक भाव में धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष के अनुसार फल देते हैं। चतुर्थ और अष्टम भाव मोक्ष के भाव हैं। आज दुनिया में ज्यादातर व्यक्ति धर्म की तरफ कम और भौतिक सुखों की तरफ ज्यादा ध्यान दे रहे हैं। परन्तु ज्योतिष का नियम है कि शनिदेव जिस भाव से धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष के लिए गोचर करे, उसी के अनुरूप व्यक्ति को कार्य करना चाहिए। जो व्यक्ति ढैय्या में तीर्थ यात्रा, समुद्र स्नान और धर्म के कार्य दान-पुण्य इत्यादि करते हैं, उन्हें ढैय्या में भी शुभ फल की प्राप्ति होती है। लेकिन जो उस अवधि में इन कामों से दूर रहते हैं, उन्हें अपने ही पूर्वकृत अशुभ कर्मों के फलस्वरूप शारीरिक-मानसिक परेशानी और कारोबार में हानि होती है।
चतुर्थ भाव की ढैय्या
ढैय्या का फल जानने के लिए सर्वप्रथम यह देखा जाता है कि शनिदेव किस भाव में बैठे हैं और कहां-कहां उनकी तीसरी, सातवीं व दसवीं पूर्ण दृष्टि पड़ रही है क्योंकि उन भावों से संबंधित बातों में जातक को पूर्वकर्मवश अशुभ फल की प्राप्ति होती है। चतुर्थ भाव से शनिदेव छठे भाव को, दशम भाव को तथा लग्न को देखते हैं। अर्थात् जब शनिदेव चतुर्थ भाव से गोचर करते हैं तो जातक के निजकृत पूर्व के अशुभ कर्मों के फलस्वरूप उसके भौतिक सुखों यानी मकान व वाहन आदि में परेशानी पैदा होती है जिसका संकेत कुण्डली में शनिदेव की स्थिति दिया करती है। जिसकी वजह से उसके कारोबार में फर्क पड़ता है। उसकी परेशानी बढ़ जाती है। परेशानियों के बढ़ने से जातक को शारीरिक कष्ट की भी प्राप्ति होती है। अर्थात् चतुर्थ भाव की ढैय्या में मकान खरीदना या बेचना नहीं चाहिए। साथ ही अपने व्यवसाय में भी कोई विशेष परिवर्तन नहीं करना चाहिए। जो व्यक्ति अधिकतर शांत रहते हैं और धार्मिक कार्यों में संलग्न रहते हैं, ऐसे व्यक्तियों को चतुर्थ ढैय्या में किसी भी प्रकार की परेशानी पैदा नहीं होती है। और जो व्यक्ति नया कार्य करते हैं, उन्हें परेशानी पैदा होती है।
अष्टम भाव की ढैय्या
जब शनिदेव चंद्र कुंडली अर्थात जन्म राशि के अनुसार अष्टम भाव से गोचर करते हैं तो ढैय्या देते हैं, अष्टम ढैय्या चतुर्थ की ढैय्या से ज्यादा अशुभ फलों का संकेत देती है। मेरे अनुभव के अनुसार जब यह ढैय्या शुरू होती है तो जातक को शुभ फल की प्राप्ति होती है और वह नया कार्य करने लगता है। परन्तु अष्टम ढैय्या नया कार्य शुरू कराकर बीच में ही धोखा दे जाती है। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को अष्टम ढैय्या में विशेष सावधानी बरतनी चाहिए। क्योंकि अष्टम भाव से शनिदेव तीसरी दृष्टि से दशम भाव को सप्तम दृष्टि से द्वितीय भाव को और दशम दृष्टि से पंचम भाव को देखता है। अष्टम ढैय्या सबसे पहले कारोबार में परेशानी पैदा करती है। जिसकी वजह से जातक के निजी कुटुंब और धन पर बुरा असर पड़ता हैं तथा धन की वजह से जातक के संतान के ऊपर भी कुप्रभाव पड़ता है। अष्टम ढैय्या में देश, काल व पात्र के अनुसार संतान को कष्ट अथवा संतान से कष्ट प्राप्त होता है। अत: जातक को अष्टम ढैय्या में कोई भी नया कार्य, यानी बैंक आदि से कर्ज या जमीन-जायदाद का खरीदना-बेचना या पिता की संपत्ति को बांटना नुकसानदायक होता है। अत: इस ढैय्या के दौरान ये कार्य नहीं करने चाहिए। अष्टम ढैय्या में जो व्यक्ति धार्मिक कार्य, समुद्र स्नान व तीर्थ यात्रा आदि करता है और परमात्मा को हाजिर-नाजिर रखता है तो उस व्यक्ति को अष्टम ढैय्या में किसी भी प्रकार की परेशानी नहीं होती है। जो व्यक्ति परमात्मा में विश्वास नहीं करते हैं, उन्हें शनिदेव लालच देकर ऐसा फंसा देता है कि वे जीवन भर परेशान रहते हैं। फिर भी याद रहे, इस प्रतिकूल परिस्थिति के पीछे भी संबंधित जातक के पूर्वकृत अशुभ कर्म ही रहते हैं।
ढैय्या किसको और कब
- शनिदेव जब कर्क एवं वृश्चिक राशि में भ्रमण करते हैं तो मेष राशि के लोगों पर शनिदेव की ढैय्या रहती है।
- शनिदेव सिंह व धनु राशि में गोचर में भ्रमण करते हैं, तब वृष राशि के लोगों पर शनिदेव की ढैय्या रहती है।
- कन्या व मकर राशि में शनिदेव के भ्रमणकाल में मिथुन राशि के लोगों पर शनिदेव की ढैय्या रहती है।
- तुला एवं कुम्भ राशि में गोचर में शनिदेव जब भ्रमण करते हैं तब कर्क राशि के लोगों पर शनिदेव की ढैय्या रहती है।
- गोचर भ्रमणकाल में शनिदेव जब वृश्चिक और मीन राशि में आते हैं तो सिंह राशि वालों पर शनिदेव की ढैय्या रहती है।
- शनिदेव जब धनु और मेष राशि में स्थित होते हैं तो कन्या राशि के लोगों पर शनिदेव की ढैय्या रहती है।
- शनिदेव जब मकर एवं वृष राशि में गोचर में स्थित रहते हैं तब तुला राशि के जातकों पर शनिदेव की ढैय्या रहती है।
- गोचर में शनिदेव जब कुंभ और मिथुन राशि में प्रवेश करते हैं तो वृश्चिक राशि के लोगों पर शनिदेव की ढैय्या रहती है।
- शनिदेव जब गोचर में मीन तथा कर्क राशि में स्थित रहते हैं तब धनु राशि के लोगों पर शनिदेव की ढैय्या रहती है।
- जब शनिदेव मेष और सिंह राशि से गोचर करते हैं तब मकर राशि वालों को शनिदेव की ढैय्या प्रारम्भ होती है।
- गोचर में शनिदेव जब वृष और कन्या राशि में आते हैं तब कुम्भ राशि वालों को शनिदेव की ढैय्या प्रारम्भ होती है।
- शनिदेव जब गोचर में मिथुन व तुला राशि में गोचर करते हैं तब मीन राशि वाले लोगों को शनिदेव की ढैय्या प्रारम्भ होती है।
ढैय्या में व्यक्ति को धैर्य से काम लेना चाहिए क्योंकि ढैय्या में व्यक्ति को अपने सगे संबंधियों की भी मदद कम से कम मिलती है। इसलिए स्वयं सभी कार्य करने पड़ते हैं। इसलिए प्रतिदिन प्रात:काल चिड़ियों को दाना डालें, उनके लिए पानी रखें। चींटियों को आटा शक्कर डालें और स्नान आदि से निवृत होकर सूर्य को प्रतिदिन जल दें। बुरे कार्यों से बचें। ढैय्या में सलता प्राप्त होगी। वैसे आगे उपाय विस्तार से लिखे हुए हैं परंतु उपरोक्त बातें दैनिक जीवन में जरूरी हैं।
शनिदेव की साढ़ेसाती का आज सारे संसार में हौवा बना हुआ है। यदि किसी व्यक्ति को यह कह दिया जाये कि तुम पर शनिदेव की साढ़ेसाती चल रही है तो न जाने उस व्यक्ति के दिमाग में क्या-क्या भ्रान्तियाँ उत्पन्न हो जाती हैं।
अभी थोड़े दिन पहले की बात है। राजस्थान प्रवास के दौरान एक मेरे प्रिय भक्त घबराये हुए मेरे पास आए। मैंने देखा कि वह बहुत ही चिन्तित हैं। मैंने पूछा, ''क्या बात है भई?'' तो उन्होंने मुझे बताया कि पिछले दिनों मैंने अपनी जन्मपत्री एक पंडित जी को दिखायी तो उन्होंने कहा कि आने वाले वर्ष में आपको शनिदेव की साढ़ेसाती का सामना करना पड़ेगा। कहते हैं कि साढ़ेसाती बहुत खराब होती है, वह संबंधित व्यक्ति और उसके परिवार वालों के लिए बहुत कष्टदायक होती है, कारोबार में घाटा होता है, किसी प्रियजन के बिछुड़ने का भी दु:ख होता है। परिवार में किसी को भयंकर बीमारी भी हो सकती है। .....
साढ़ेसाती के संबंध में न जाने कितनी तरह की भ्रांतियां उस सज्जन के मन में उथल-पुथल मचायी हुई थीं। मैंने उस सज्जन से, जो बहुत बड़े अफसर और विद्वान भी थे, पूछा कि आपका इसके बारे में क्या विचार है? क्या ऐसा होगा? उस सज्जन के पास मेरे सवाल का कोई जवाब न था। उन्हें तो शनिदेव की साढ़ेसाती में मिलने वाले दुख व बाधाओं का दृश्य रातों दिन बार-बार नजर आ रहा था।
मैंने उन्हें बहुत समझाया कि शनिदेव की साढ़ेसाती हर व्यक्ति के लिए एक ही प्रकार की नहीं होती। इस विषय में कई बातों का विश्लेषण करने के बाद ही कोई निर्णय निकाला जा सकता है। लेकिन उन्हें मेरी बातों पर विश्वास नहीं हो रहा था।
मेरे मित्रो, यह हाल आज के विद्वान कहे जाने वाले मनुष्यों का है, शनिदेव की साढ़ेसाती के बारे मेें। वास्तव में यदि मेरा व्यक्तिगत अनुभव पूछा जाए तो सभी जातक-जातिकाओं पर साढ़ेसाती का प्रभाव एक जैसा नहीं होता। क्योंकि शनिदेव एक ऐसे ग्रह हैं जो संतुलन एवं न्याय का प्रतीक माने जाते हैं। ज्योतिष विद्या की शब्दावली में श्री शनिदेव तुला राशि में उच्च के होते हैं व मेष राशि में नीच के। यहाँ यह बात स्पष्ट रूप से समझ लेनी चाहिए कि कोई भी ग्रह उच्च या नीच नहीं होता। किसी राशि विशेष में उच्च का होने का तात्पर्य उत्तम फल देने वाला और नीच का तात्पर्य प्रतिकूल फल देने वाला होता है। किंतु नीच का होने के बावजूद शनिदेव कभी-कभी जातकों को अनुकूल फल भी उपलब्ध कराते हैं। शनिदेव के स्वभाव का एक महत्वपूर्ण गुण यह है कि ये अनुचित विषमता तथा अस्वाभाविक सक्षमता को पसन्द नहीं करते। जो जातक-जातिकाएं उपरोक्त व्यवहार अपनाते हैं, शनिदेव उन पर कुपित हो जाते हैं।
शनिदेव के कुपित होने का अर्थ यह है कि संबंधित जातक अन्याय एवं अनावश्यक विषमताओं का साथ दे रहा है। ऐसे मनुष्यों को शनिदेव दंडित कर उनका शुध्दिकरण करते हैं। साथ ही उन्हें सही मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित भी करते हैं। ऐसी स्थिति में यह कहना कि शनिदेव की साढ़ेसाती की पूरी अवधि खराब है, एकदम गलत है। क्योंकि यदि एक बच्चा स्कूल से एक पेंसिल चुरा कर घर ले आये और मां उसे दंड देने के बजाय उसे प्रोत्साहन दे तो वह भविष्य में एक दिन बहुत बड़ा चोर बन जायेगा। यदि उसे पहले दिन ही पेंसिल चोरी के लिए दंडित कर दिया जाये तो वह दंड उसे हमेशा सन्मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करेगा। या यूं कह दीजिए कि सुनार सोने को गर्म आग में रखकर ही सुन्दर आभूषणों के लिए ढालता है, ठीक उसी प्रकार शनिदेव न्याय अधिकारी बनकर जातक-जातिकाओं के पापों की सजा देकर उन्हें पवित्र कर सुख-सम्पत्ति एवं धन देते हैं।
शनिदेव का एक विशेष गुण यह भी है कि वह दूध का दूध एवं पानी का पानी कर देते हैं। यानी वह सच्चे और झूठे का भेद भलीभांति समझते हैं। शनिदेव बहुत बड़े उपदेशक, शिक्षक एवं गुरु भी कहे जाते हैं, जो जातक को विपत्ति और कष्ट, अभाव व निर्धनता रूपी तापों से तपाकर मलहीन बनाते हुए उसे उन्नति के सोपान पर लाकर खड़ा कर देते हैं। यानी इस बात को अच्छी तरह समझ लेना चाहिए कि साढ़ेसाती में यदि शनिदेव प्रतिकूल परिस्थितियों का संकेत देने वाले भाव में बैठे हैं तो हमारे प्रारब्ध या यिमाण कर्म में कहीं न कहीं त्रुटि जरूर रही है और उसका फल हमें साढ़ेसाती में अवश्य भुगतना होगा।
अब मैं आपको ज्योतिषीय भाषा में शनिदेदव की व्याख्या करने जा रहा हूं लेकिन आप इस बात को मत भूलना कि शनि कर्मों का फल देते हैं। आपके कर्म के आधार पर आप पर यह फल लागू होगा। क्योंकि कभी समय अच्छा या बुरा नहीं होता अच्छे बुरे तो हमारे कर्म होते हैं और कर्मों के आधार पर समय अच्छा या बुरा होता है।
परन्तु यदि हमें यह ज्ञात हो जाए कि साढ़े सात वर्ष में से कौन सा समय अच्छा जायेगा, या कौन सा समय बुरा जायेगा, तो संबंधित व्यक्ति तदनुसार कदम उठाकर हर हालत में अपने को खुशहाल रखने की युक्ति निकाल सकता है। उसे यह मालूम हो जाये कि आज मेरा समय खराब है, अत: मैं अच्छा कार्य करूं, कल शुभ समय भी आने वाला है तो वह दु:ख एवं मुसीबतों को सहते हुए भी उनको भुलाकर सुख व सुनहरे पल का इन्तजार करेगा। सुख के इंतजार में बड़ा से बड़ा दुख भी आसानी से कट जाता है। वैसे भी यह परंपरा है कि अंधेरी रात के बाद सदैव सुबह होती है। आज दुख है तो कभी सुख भी अवश्य आयेगा।
अत: शनिदेव की साढ़ेसाती को हौवा समझ उससे डरने के बजाय हम अपने यिमाण कर्म को सुधारें तो अच्छा रहेगा। याद रहे, शनिदेव की साढ़ेसाती का प्रभाव तीन चरणों में होता है और तीनों चरण एक समान नहीं होते, तीनों चरणों में संबंधित व्यक्ति को सुख-दुख के अलग अलग स्वाद चखने को मिलते हैं।
शनिदेव पूरे भच का 30 वर्ष में एक चक्कर लगा पाते हैं। अर्थात एक राशि में ढाई वर्ष रहते हैं। मनुष्य अपने स्वार्थवश अच्छा-बुरा कार्य करता रहता है। जब शनिदेव उसकी राशि में प्रवेश करता है तो पिछले 30 वर्षों में जो जातक ने अच्छे-बुरे कार्य किये हैं, उनका ऑडिट करते हैं। ऑडिट करने पर वह देखते हैं कि इस जातक का पिछले 30 वर्षों का कैसा व्यवहार रहा। यदि अच्छा रहा, मानवता के प्रति प्रेम भरा रहा तो साढ़ेसाती में सुख प्राप्त होता है और यदि मानवता के प्रति दर्ुव्यवहार रहा तो जितना दर्ुव्यवहार रहा उसके अनुसार उसे सजा देते हैं। इसलिए व्यक्ति का मानवता के प्रति अच्छा व्यवहार रहे। नेक कमाई करे तो उसे साढ़ेसाती ढैय्या में किसी भी प्रकार का कष्ट प्राप्त नहीं होता है। अनेक राजनीतिज्ञों को शनिदेव की साढ़ेसाती में ऊँचाइयों पर चढ़ते देखा गया है।
मैं शनिदेव की साढ़ेसाती के बारे में आपको निज अनुभव के आधार पर थोड़ा विश्लेषण दे रहा हूं जो मैंने भारतीय ज्योतिर्विद मनीषियों एवं महात्माओं के कृपा-प्रसाद के रूप में प्राप्त की। शनिदेव का नाम सुनकर अक्सर लोगों में भय का आतंक व्याप्त हो जाता है। शनिदेव की साढ़ेसाती का हौवा जनमानस में अति प्राचीनकाल से चला आ रहा है। जिससे जातकों के मन में भीषण भय एवं सघन संत्रास उत्पन्न करने वाली स्थिति पैदा हो जाती है। इस संबंध में लोगों के मन में अनेक भ्रांतियां बैठी हैं। लौकिक कथाओं में इसकी विनाशकारी स्थितियों को प्रस्तुत किया गया है। अत: इस दशा में व्यवस्थित विवेचन की अनिवार्यता स्वत: सिध्द है।
वैसे ज्योतिष शास्त्रोेंं के अनुसार शनिदेव यदि जन्मराशि से द्वादश, लग्न व धन भाव में स्थित हों तो उसकी साढ़ेसाती शुरू हो जाती है और ढाई वर्ष तक शनि की दृष्टि प्रथम चरण में पड़ती है और संकेत देती है कि पूर्व कर्मों के फलस्वरूप जातक को आर्थिक कठिनाइयों, शारीरिक कष्ट, स्थान परिवर्तन, अधिकाधिक व्यय और आमदनी कम होने से मानसिक तनाव, वैवाहिक मामले में व्यवधान आदि फल प्राप्त होने वाले हैं। यदि शनि जन्म राशि में स्थित हो तो भी ढाई वर्ष तक भोग काल कहा जाता है। दूसरे चरण में पूर्वकृत निजकर्मों के फलस्वरूप जातकों को व्यावसायिक हानि, सम्बंधियों को कष्ट, यात्रा, मित्रों का अभाव, शत्रु, पीड़ा व कार्यों में अवरोध आदि फल मिलते हैं। तीसरे चरण में पूर्वकृत निजकर्मों के फलस्वरूप जातको को सुख का अभाव अधिकाधिक व्यय से मानसिक व्यग्रता, गलत आचरण रखने वालों से संबंध, विरोध, विवाद व संबंधियों से मतभेद तथा असहयोग का वातावरण बना रहता है। यह अक्सर नेत्रों, उदर और पैर में निवास करता है। वैसे इसे अच्छा भी मानते हैं। ढैया और अल्प-कल्याणकारी में ढाई वर्ष तक रहने वाली अन्य शनि दशा भी है।
कल्याणी प्रददाति वै रविसुता राशेश्चतुर्थाष्टमे।
वैसे शनिदेव मेषादि राशियों का चक्कर 30 वर्ष में पूरा कर लेते हैं। ज्योतिष गणना के अनुसार ये एक राशि में लगभग ढाई वर्ष तक रहते हैं। साढ़ेसाती का आरंभ तब होता है जब शनिदेव चन्द्र राशि से द्वादश भाव में संचार करते हैं। लग्न या द्वितीय भाव तक साढ़ेसाती का प्रभाव मवार चलता है। इन्हीं साढ़े सात वर्षों को साढ़ेसाती के नाम से जानते हैं।
शनिदेव की साढ़ेसाती क्या और किस पर?
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार शनिदेव की साढ़ेसाती तब प्रारम्भ होती है जब शनिदेव जातक की जन्म राशि अर्थात् (वह राशि जिसमें चन्द्रमा बैठता है, उससे पहले वाली राशि चन्द्र कुण्डली से द्वादश भाव में प्रवेश करते हैं तो यहां ये ढाई वर्ष रहते हैं। उसके बाद शनिदेव प्रथम भाव जन्म राशि में प्रवेश करते हैं, फिर ढाई वर्ष का समय लेते हैं, इसके बाद वह अगली राशि द्वितीय भाव में प्रवेश कर फिर वहां ढाई वर्ष का समय लेते हैं। यानी शनिदेव जन्मराशि की पहली राशि मेें प्रवेश करते हैं तो शनिदेव की साढ़ेसाती प्रारम्भ होती है, पूरे साढ़े सात वर्ष के बाद शनिदेव जब जन्म राशि से अगली राशि को पार कर जाते हैं तो शनिदेव की साढ़ेसाती समाप्त हो जाती है। अब मैं आपको जानकारी दे रहा हूं कि शनिदेव जब किसी राशि में होता है तो किस राशि के जातक को शनिदेव की साढ़ेसाती होती है।
- जब शनिदेव गोचर में भ्रमण करते हुए मीन, मेष और वृष राशियों पर भ्रमण करते हैं तो मेष राशि के व्यक्तियों को शनिदेव की साढ़ेसाती प्रारम्भ होती है।
- मेष, वृष और मिथुन राशि के भ्रमण काल में वृष राशि पर शनिदेव की साढ़ेसाती रहती है।
- शनिदेव जब वृष, मिथुन और कर्क राशि में स्थित हों, तब मिथुन राशि वालों को शनिदेव की साढ़ेसाती रहती है।
- शनिदेव जब मिथुन, कर्क और सिंह राशि पर भ्रमण करते हैं तो कर्क राशि वालों को शनिदेव की साढ़ेसाती रहती है।
- शनिदेव जब कर्क, सिंह और कन्या राशि में स्थित हो तो सिंह राशि वालों को शनिदेव की साढ़ेसाती रहती है।
- शनिदेव गोचर भ्रमण काल में सिंह, कन्या एवं तुला राशि में हाें तो कन्या राशि के जातकों को शनिदेव की साढ़ेसाती रहती है।
- शनिदेव कन्या, तुला व वृश्चिक राशि में भ्रमण करते हैं तो तुला राशि पर साढ़ेसाती रहती है।
- शनिदेव जब तुला, वृश्चिक एवं धनु राशि में स्थित हों तो वृश्चिक राशि वाले जातकों को शनिदेव की साढ़ेसाती रहती है।
- जब गोचर में शनिदेव वृश्चिक, धनु व मकर राशि पर हों तो धनु राशि वालों को शनिदेव की साढ़ेसाती रहेगी।
- जब शनिदेव धनु, मकर एवं कुंभ राशि में हो तो मकर राशि वालों को शनिदेव की साढ़ेसाती रहती है।
- शनिदेव जब गोचर में मकर, कुंभ व मीन राशि में प्रवेश करते हैं तो कुंभ राशि के लोगों को शनिदेव की साढ़ेसाती रहती है।
- शनिदेव जब कुंभ, मीन एवं मेष में आते हैं तो मीन राशि वाले जातक-जातिकाओं के लिए शनिदेव की साढ़ेसाती रहती है।
जो व्यक्ति प्रथम बार साढ़ेसाती से गुजर जाता है, उसे पुन: 30 वर्ष पश्चात शनिदेव की साढ़ेसाती से प्रभावित होना पड़ता है। अगर अपवाद को छोड़ दिया जाये तो जातक को अपने जीवन में तीन बार साढ़ेसाती का सामना करना पड़ता है। साढ़ेसाती से अक्सर लोग भयाांत हो जाते हैं। लेकिन सब साढ़ेसाती अनिष्टकारक नहीं होती। शनिदेव जन्मांक के अनुसार फल प्रस्तुत करते हैं। कुछ ज्योतिर्विदों के कथनानुसार - शनिदेव जन्म-राशि के अनुसार परिणाम को प्रस्तुत करते हैं।
मेष मध्यभाग प्रतिकूल
वृषभ :- प्रारंभ प्रतिकूल
मिथुन :- अंत प्रतिकूल
कर्क :- मध्य व अंत प्रतिकूल
सिंह :- प्रारंभ व मध्य प्रतिकूल
कन्या :- प्रारंभ प्रतिकूल
तुला :- अंत प्रतिकूल
वृश्चिक :- मध्य व अंत प्रतिकूल
धनु :- प्रारंभ व मध्य प्रतिकूल
मकर :- प्रारंभ भाग अधिक प्रतिकूल
कुंभ :- समस्त समय शुभ
मीन :- अंत प्रतिकूल
याद रहे, शनिदेव की साढ़ेसाती में किसी जातक पर शनिदेव के प्रतिकूल प्रभाव का प्रतिकूल प्रभाव का अर्थ यह नहीं कि शनिदेव किसी को अपनी तरफ से प्रतिकूल फल प्रदान करते हैं। यह तो उस जातक के अशुभ कर्मों का ही फल होता है जिसका संकेत कुण्डली में शनिदेव की स्थिति से मिलता है। उसी को ज्योतिष की शब्दावली में शनिदेव का प्रतिकूल प्रभाव कहा जाता है। फल देते समय शनिदेव संबंधित जातक या जातिका को कड़ा संघर्ष कराते हैं, उसको कड़े संघर्ष के उपरांत शनिदेव अध्यात्म की अनन्त गहराइयों में ले जाते हैं और उसके मोक्ष का द्वार खोल देते हैं। इसके अलावा तीनों चरणों का परिणाम ऐसा होता है -
प्रथम चरण - पूर्वकृत अशुभ कर्मों के फलस्वरूप ऐसे व्यक्तियों की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं होती है। इनके पास व्यय के स्रोत अनेक होते हैं। ये जो सोचते हैं, वह कर नहीं पाते। इनके अनेक कार्य यथावत् पड़े रहते हैं। ये शारीरिक व्याधि से पीड़ित रहते हैं। इनके परदेश गमन का भी अक्सर प्रोग्राम बनता रहता है। इनकी दादी को मारक कष्ट होता है। इन्हें नेत्रों की व्याधि भी संभव है। इनको प्राय: मानसिक परेशानियां बनी रहती है। व्यय के अनुरूप इनको आय नहीं हो पाती। इन्हें दाम्पत्य जीवन में भी अत्यंत कठिनाई आती है। पिता की तरफ से तो तरह-तरह की परेशानियां होती ही रहती हैं।
द्वितीय चरण - ऐसी स्थिति में संबंधित मनुष्य को निजकृत अशुभ कर्मों के फलस्वरूप व्यवसाय में अक्सर क्षति होती है। उसके सगे-संबंधियों को कष्ट पहुंचता है। इस दौरान यात्रा का भी योग बनता है तथा उसे विरोधियों से परेशानी होती है। रोग भी उसका पीछा नहीं छोड़ते। उसके लिए सही मित्रों का मिलना मुश्किल हो जाता है। कार्यों में बराबर गतिरोध पैदा होता रहता है। तरह-तरह की चिंताएं उसे बराबर बनी रहती हैं। सारे कार्य यथावत स्थिति में पड़े रहते हैं। कोई भी कार्य संतोषजनक नहीं होता। परिणाम स्वरूप मन में बराबर व्यग्रता बनी रहती है।
तृतीय चरण - ऐसी स्थिति में संबंधित व्यक्ति का सुख निजकृत अशुभ कर्मों के फलस्वरूप अक्सर कमजोर होता जाता है। वह अधिकार से वंचित होने लगता है। कभी-कभी ऐसे मनुष्य को शारीरिक क्षति भी होती है तथा उसकी खुशी में गतिरोध पैदा होता रहता है। उसकी आय की तुलना में व्यय की मात्रा अधिक होती है। अक्सर उसका गलत व्यक्तियों से भी संबंध होता है। परिणाम स्वरूप विरोध और विवाद उत्पन्न होता है। इस दौरान सगे-संबंधी भी उससे कटे-कटे से रहते हैं। ऐसी स्थिति में जातक का स्वास्थ्य खराब हो जाया करता है तथा सुख-सुविधा में भी कमी आती है। इनका जीवन संतोषजनक नहीं व्यतीत होता।
साढ़ेसाती की आवृत्तियां
पहले हम इस बात की चर्चा कर चुके हैं कि जिस व्यक्ति पर शनिदेव की साढ़ेसाती एक बार अपना प्रभाव दिखा चुकी होती है, उस व्यक्ति पर पुन: 30 वर्ष उपरांत साढ़ेसाती अपना प्रभाव दिखाती है। सामान्य तौर पर जीवन में तीन बार शनिदेव की साढ़ेसाती अपना प्रभाव डालती है। लेकिन हर आवृत्ति में जातक पर शनिदेव के प्रभाव भिन्न-भिन्न होते हैं।
साढ़ेसाती की पहली आवृत्ति में शनिदेव जो फल देते हैं, वह संबंधित जातक-जातिका के पूर्वकृत अशुभ कर्मों के फलस्वरूप अत्यंत प्रबल होता है। व्यक्ति की मानसिक स्थिति अत्यंत उद्वेलित हो जाती है। वह निदान हेतु प्रयासरत रहता है लेकिन द्वितीय आवृत्ति पहली से कम तीव्र होती है। उसमें व्यक्ति सारे कष्टों के बावजूद अपने को संयमित रख पाता है। साढ़ेसाती की तृतीय आवृत्ति का परिणाम बड़ा तीव्र प्रभाव देने वाला होता है। उसमें जातक चारों तरफ से आपत्तियों से घिर जाता है। परिणाम स्वरूप ऐसी परिस्थिति में कोई भाग्यवान व्यक्ति ही अपने को सुरक्षित रख पाता है। इसके दशाफल की जानकारी रखना अत्यंत आवश्यक है।
- अगर गोचर में शनिदेव अशुभ फलों की प्राप्ति का संकेत कर रहे हैं तो उस स्थिति में अन्य ग्रहों के फलों में भी न्यूनता आ जाती है।
- जब शनिदेव जातक के पूर्वकृत अशुभ कर्मों के फलस्वरूप अमंगलकारी परिणाम प्रदान करते हैं और बृहस्पति मंगल फल की प्राप्ति कराता हो तो ऐसी स्थिति में अशुभ फलों में वृध्दि हो जाती है। इस अवधि में शनिदेव के तैलाभिषेक, पूजन, जप-अनुष्ठान आदि द्वारा प्रारब्ध जनित प्रतिकूल स्थिति से निजात पाया जा सकता है। वास्तव में शनिदेव न्याय प्रिय देवता हैं। कालपुरुष की कुंडली में कर्म व व्यय स्थान का स्वामी हैं। अत: वे हमारे पूर्वकृत कर्मों के न्यायपूर्वक फल देते हैं। अत: हम अपने यिमाण कार्यों में वांछनीय सुधार लाकर शनिदेव को अनुकूल कर सकते हैं।
- अगर शनिदेव मंगल फलदाता हों और बृहस्पति अशुभ फल प्रदाता हों तो उस स्थिति में अनुकूल परिणाम की प्राप्ति होती है।
- यदि बृहस्पति और राहु के परिणाम अमंगलप्रद हाें और शनिदेव मंगलमय परिणामों को प्रदान करते हों तो उसमें ज्यादा परिणाम शुभ होते हैं।
अगर इन बातों को ध्यान में रखकर फल का परिणाम घोषित किया जाये तो ज्यादातर सत्यांश पुष्ट होते हैं।
सूर्य प्रत्येक ग्रह दशा का परिणाम प्रदान करते हैं। शनिदेव उस फल का संपोषण करते हैं। इसलिए दशा आरंभ के समय चन्द्रमा की स्थिति की जानकारी जरूरी है। शनिदेव की महादशा के आरंभ में गोचरीय चन्द्रमा मेषादि राशि में हो तो फल में अंतर हो जाता है।
चन्द्र दशा के आरंभ में चौथे यानी कर्क राशि में हों तो जातको को नारी का निश्छल प्रेम एवं सान्निध्य हासिल होता है। उसे लोक समादर उपलब्ध होता है। यदि मेष अथवा वृश्चिक राशि में हो तो दांपत्य सुख में कमी साथ ही निजकृत अशुभ कर्मों की वजह से प्रतिकूल परिस्थितियों का सामना भी करना पड़ सकता है। अगर कन्या या मिथुन राशि में हो तो ये लोग उच्च कोटि के विद्वान होते हैं तथा उन्हें अक्सर कुटुम्बजनों से सहयोग की प्राप्ति होती है। लेकिन तुला तथा वृष राशि हो तो भोजन-भूषण और भोग का यथोचित आनंद प्राप्त होता है। विरोधी पक्ष उनसे खुद अपनी हार मान बैठते हैं। धनु और मीन राशि में हो तो ये लोग अनुचर, सुख-संपत्ति, मान-सम्मान और आनंद की उपलब्धि करते हैं। मकर और कुंभ राशिस्थ हो तो ये व्यक्ति चतुर होते हैं और इनको अपनी से बड़ी उम्र के लोगों से अधिक लाभ प्राप्त होता है। सिंह राशि स्थित हो तो एकांतवास, घर-गृहस्थी में पारिवारिक विवाद और प्रेमाभाव होता है।
इस बात से यह ज्ञात हो जाता है कि शनिदेव भावगत, राशिगत व दशाओं के अनुसर फल प्रदान करते हैं।